Archive for the ‘हिंदी कविता’ Category

टीस

29 12 2007

विश्व-निर्माणके पूर्व ,
था ब्रह्म एकल सम्पूर्ण
सदैव सत-चित-आनंदमें स्थित
परंतु स्वयमसे अपरिचित
किसीभी अनुभूतीसे परे
अद्वैत सर्वत्र विचरे

अनुभवके माध्यमसे
अपने आपको जाननेकी,
किसी और दृष्टीसे
स्वयमको पहचाननेकी
आंतरिक स्फूर्तीसे
हुई रचना फिर द्वैतकी !

स्वयमसे भिन्न होकर
परम-आनंदकी दशा त्यागकर
ब्रम्हने सोच विचार कर
टीसका आविष्कार कर,
आत्म-अनुभूतीके हेतुसे,
किया आरंभ विश्वसंभार फिर !

अद्वैत छोड गर प्रभू
न त्यागते आनंदको,
और अपनाते द्वैतकी टीसको
शायदही होता अनेकता,
भिन्नताका यह निर्माण…
ना ही मिलता किसीभी
अनुभवका यथार्थ परिमाण !

क्योंकी एकही होता है

स्वर्ग तो सबका,
किंतु नर्क अपना
अलग हरेक का….

सही मानेमें यह एक वरदान,
अपनी टीसही ,

देती है प्रत्येकको
अपनी-अपनी, अलग पहचान !

मुखौटे

25 11 2007

आपके विषयमें नहीं जानता,
पर मेरे पास हैं बहुतसे
सालोंसे हूँ इन्हें पहनता
ये हो गए हैं अब अपनेसे

जबसे होश सम्हाला है,
इन्हींके बलपर गुजारा है
जबभी दुविधामें पैर डाला है
इसी सुविधाका सहारा है !

रोज इन्हें साथ ले निकलता हूँ,
जाने कब  कौन काम आए !
समय परखके ओढ़ता हूँ,
जिससे भी काम बन जाए.

झाँक भीतर आजकल मैं
पानी है जहाँ बहुत गेहरा
अपनेही मुखौटोंकी  भीड़में,
खोजूँ अपना असली चेहेरा

इनके प्रयोगमें हूँ माहिर,
भई, बरसोंकी तपस्या है,
न हो जाऊं खुदसेही जाहिर
बस, यही इक समस्या है !
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शादी

13 11 2007

( फिल्म ” कभी कभी ” की इस मूल रचनासे जुडी हम सभीकी
भावनाओंकी क्षमा चाहता हूँ ! )

कल नया किस्सा शुरु होगा

कल फिर एक नौजवाँ शहीद होगा,

धूमधामसे बडेसे हॉलमें

मेरे दोस्तका कल ब्याह होगा.

वह मेरी शादीमें नहीं आया

मैं उसकी शादीमें क्यूँ जाऊं ?

उसकी रिसेप्शनके आईस्क्रीमका

मैं एकभी टुकडा क्यूँ खाऊं ?

वह बस एक दिनका दुल्हा है,

एक दिनकी उसकी कहानी है

कुछ दिन दुनिया सुहानी है

आगे तो बस हैरानी है…..

कालचक्र

10 11 2007

कोवळी सूर्यकिरणं लेवून
पहाट तळ्यावर अलगद येते
पाण्यात प्रतिबिंब पाहून
स्वतःशीच मोहरते..
सोनेरी बटांनी वेडावलेल्या
पक्षिणीचं गाणं ऐकून हरखते
हिरवळीत, दवातून
आरक्तगाली हसते,
मान वेळावून कमलिनी
पहाटेकडे पहातच रहाते.

पूर्णसूर्य भाळी घेउन माध्यान्ही,
दुपार येऊन थडकते,
कडेवरून झेपावणारं
बिंब पाण्यात न्याहाळते.
काठावर त्याला सोडून
फुलाबाळांत रमवते
घनदाट काळ्याभोर छायेत
सूर्यासोबत रेंगाळते,
अन् उन्हासावल्यांशी खेळून
दमून झाडाशी विसावते.

सूर्याला मार्गस्थ करून,
तळ्याशी संध्याकाळ अवतरते.
झोपाळलेल्या भुरकट सावल्यांना,

थोपटून निजवते
दिवसभर उंडारलेल्या फुलापाखरांना
दामटून घरट्याची ओढ लावते,
उगवत्या तार्‍याच्या मदतीनं
पुढचे वेध घेऊ लागते,
चिडीचुप झालं की झाकपाक करुन
तळ्याकाठीच मुटकुळं होते.

यथावकाश टिपूर केसांची ती
पुनवेची रात्र तळ्यावर पोहोचते.
इकडचा तिकडचा कानोसा घेत
ती चांदण्यांना बोलावणं करते
वाटोळं चंद्रमुख तळ्यात बघत
काठाने येरझारा घालत रहाते
दमल्यावर मग गार पाण्यात
ऐसपैस पाय सोडून बसते.

पण आता घटिका भरत आलेली असते–

मग बळेबळेच उठून
पहाटगर्भ सांभाळत
जड पायांनी रात्र ,
रामप्रहरीच हळूहळू चालू लागते…..

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यात्रा ( हिन्दी रूपांतर )

—-

दबे पाँव तालाबपर सुबह आती है,
कच्ची धूपकी चुनर ओढे
जलमें अपनी प्रतिमा देख
मनही मन लज्जित हो उठती है
सुनहरी घुंगराली लटोंसे पगलाई
पक्षिणीके गीतसे ललचाती है
ओसबिंदुओंमें, हरियालीसंग
आरक्त कपोलोंमें मुस्कुराती है
कमलिनी अपनी ग्रीवा ताने
सुबहसे ताँक-झाँक करती है !

मध्यान्ह-समय ललाटपर दिनमणि धरे
दोपहर उस तालपर आ धमकती है
गोदीसे स्वतन्त्र होनेको आतुर
शिशुबिम्बको जलदर्पण दिखलाती,
तालाबतटपर उसे छोड फूलों-कलियोंमें रिझाती है
घनी छायामें संग दिनकरके टहलकर,
धूप्-छाँवसे आँख-मिचौली खेल
थकी-हारी पेड तले लेट जाती है.

यथाकाल सूर्यको नियत पथपर बिदा कर
सन्ध्या तालके किनारे आती है
नीन्दसे भारी पलकोंकी साँवली छायाओंको
सहलाकर सुलाती है
दिनभर चहकते, फुदकते पक्षियोंको
जबरन अपने-अपने घोंसलोंकी चाह दिलाती है,
उगते सितारेकी दिशाको देख
भविष्यका ताल-मेल मिलाती, और सन्नाटा छातेही
वहीं धराशायी हो लेती है.

खामोशीमें घुली, चाँदनीमें धुली,
पूर्णचंद्रमासे खिली पूनमकी रात
यथाकाल तालाबपर उपस्थित हो जाती है
रुपहले केशोंमें सितारे संजोकर
किनारेकी सैर करती, तालाबमें
चंद्रमुख निहारती है
सहसा विश्राम करने हेतु
तालके पानीमें पैरोंको भीगोने बैठ जाती है

परंतु अब बेला आन पडी होती है —

फिर रात, जैसे-तैसे जतनसे खुदको जुटाकर॑
उदरके प्रभातगर्भको सम्हाले,भारी पैरोंसे,
उजियालेकी ओर बढती

तडके एक नये दिनकी यात्रा आरंभ करती है…..

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