Archive for the ‘हिन्दी गजल’ Category

रिश्ते

29 08 2008

दोतरफा सरहदपर क्या धूम मची है गश्तोंकी
कहानियाँ यहाँ हमने खूब रची है रिश्तोंकी

खोजती रही हो तुम आशियाने दुनियाभरके
इसी शहरके पिछवाडे, वहीं गली है रिश्तोंकी

जाहिर ये है के अब तो, हम दोस्त नहीं रह पाएंगे
बात यहाँ है अपनोंकी, बात चली है रिश्तोंकी

रोक नहीं अब पाऊंगा मैं ये बहाव इन अश्कोंका
सदियोंसे इन नदियोंमेंही नांव चली है रिश्तोंकी

ले-देके मिलकियत बस इतनी जुटा पाया हूं मैं
चंद ख्वाब सजे हैं आँखोंमें और नमी है रिश्तोंकी

अमीर बडा कहलाता, भरे पडे खजाने पुश्तोंसे
मेहेरबाँ जिंदगीभी है, सिर्फ कमी है रिश्तोंकी

क्या बटवारोंकी किश्तोंसे, बच निकलेंगी ये इमारतें
हाय! फिसलते रेतपे हमने नीव रखी है रिश्तोंकी

जरा जमींपे आकर देखो, क्या रखा है जन्नतमें
इन्सानोंकी बस्तीमें बारात सजी है रिश्तोंकी !

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रूबरू

06 05 2008

वो बैठे हैं रूबरू और शाम ढलने को है
दरमियाँ का शीशा अब पिघलने को है
छोड़ आया बीच मझधार यादों को तेरी
डूबती यह नैया अब सम्हलने को है
क्या है ये शोरो-गुल, क्यों धुआँ सा है
शायद फिर कारवां निकलने को है
तेरे संग तराशे थे जो नाजों से हमने
वक़्त का दरिया वो लम्हे निगलने को है
मैंने जल्दबाजी में काटी है जिंदगी,पर
इतमिनान से बड़े दम निकलने को है
रोज नया ऐलाने-जंग सुनता हूँ मैं
देखें कौन इंसानियत कुचलने को है
मुद्दतों बाद हल्की मुस्कुराहट ये कैसी
जानता हूँ अब ये लावा उगलने को है

होली ( हिन्दी गजल )

21 03 2008

चलो रंगरेलिया मनाएं, कहां छिपी होली है
बुरा नहीं मानेगी वह, भई आखिर होली है !

अनगिनत रंगों में तेरे मैं ढला हूं जिंदगी, पर
बचा कालिख से बुराई की, आज तो होली है

चाहतों में मैं तुम्हारी कुछ भी बनने से रहा
कुछ तो बनके ही रहूंगा देख लेना, होली है

नया नाम हर रोज़ वह देता आया है मुझे
आज मीठी गाली उसकी, शायद होली है …

नाराज़ ही मुझसे रहा, कहा पर कभी नहीं
क्यों जुबां खुली है आज, याद आया होली है !