Archive for the ‘हिंदी कविता’ Category

ख्वाब

07 09 2008

कई दिनोंसे ख्वाब ये देखा है मैंने
खुदहीको तुम बनते देखा है मैंने
इन आँखोंसे है देखा उन आँखोंमें
उस मुझको जो तुमने देखा है मुझमें…

इठलाती चितवन तबस्सुमके ताने
अदाओंके नश्तर ये मासूम बहाने
हवाएंभी अब यूं लगीं हैं सताने
लाईं है महक हमें फ़िर लुभाने

दिनभर ये तुम्हारे दीदारके वहम
रात ख्वाबोंमें फिर तुम और हम
कहनेको दो हैं पर हमारी कसम
बताओ जरा जुदा कब थे हम !

माना कि अबभी बहोत  फासलें हैं
किस्मतके देखेंगे क्या फैसलें हैं
उमंगोंके नित ये नयें घोंसलें हैं
पाएंगे तुमको बुलन्द हौसलें हैं

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नैना

07 07 2008

सुख-दुखमें संग दें नैना,जीवनको रंग दें नैना
चेहेरेका गहना नैना, कहलायें चितवन नैना

पहले होते भोले नैना, दुलारसे डोलें  नैना
बात-बात रो लें  नैना,उतावले बांवले नैना

तांक-झांक मोहित नैना,हंस लें-फिसलें नैना
देख उसे मचले नैना,खुशियोंसे नच लें नैना

नित वहीं रुकते नैना,लज्जासे झुकते नैना
सजनासे लागे नैना,जीवनसे भागे चैना

जागे रातोंमें  नैना,जगाये सपनोंमें नैना
प्यारमें चंचल नैना,राह तके अविचल नैना

बिरहामें विवश नैना,दरसनको तरसे नैना
मेघा मनमें बरसे नैना,अंसुवनसे भीगे रैना

कभी वारभी सीखें नैना,अंगारभरे तीखे नैना,
खौल उठे,चीखें  नैना- प्रतिशोधमें रुखे नैना

अधिर नैना मदिर नैना,मनमानी करते नैना
अगवानी करते नैना, निगरानी करते नैना

देते हैं कसमें नैना, रीत रिवाज रसमें नैना
आईना दिलका नैना, हैं किसके बसमें नैना !

यह लम्हा

22 06 2008

दहलीजपर मुझे देख असमंझसमें तुम
अचंबित हो निहारती, बोलती है गुम
चाहता हूँ अब हम रहें कुछ गुमसुम
संदूक सवालोंकी अभी खोलना नहीं तुम

इंतजारमें कबसे यह लम्हा खडा था
भीडमें पलोंकी यह तनहा बडा था
आँधीमें शककी गया हडबडा था
अरमाँ इसे हमसे ज्यादा बडा था

दूरीकी बातें,बिरहाकी रातें.. रहने दें,
ये नैना हमारे यूँही आज बहने दें
इस लम्हेको अपने दिलकीभी कहने दें
उसे भेंटमें चंद टीसके गहने दें

होठोंके किनारोंपर तबस्सुमकी नैया
हिचकोले खाती, है असुवन खिवैया
लिहाजमें उसके थामें निगाहोंसे बैंया
के लम्हाभी कहे, क्या सजनी.. क्या सैंया !

सुबह

02 05 2008

नहीं जानता मैं कि उस ओर क्या है
यहाँसे जुदा वहाँ और क्या है
जहाँ रोशनी है, वहाँ कुछ तो होगा,
अनबनीमें शायद नया सचभी होगा…
सवालोंमें उलझासा दिलका जहाँ है
परखूँ जवाबोंको  फुरसत कहाँ है
नहाता उजालेमें कोई कल तो होगा
भरा उम्मीदोंसे कोई पल तो होगा ?
मैं हूँ मानता कि यह रस्ता नया है
सिवा हमारे न कोई गया है
पुकारे है मंझिल और जानाही होगा
होनी है सुबह दिनको आनाही होगा !

रूप कविताके

02 05 2008

जीवनमें कविता,
हर रुपमें मिलती है
कभी भावुकताकी छायामें, कभी
दर्शनकी धूपमें खिलती है.
कभी सहास्य सखी चंद्रमुखी,
अनजान अधोवदना, कभी दुखी
कभी बन बहना पहन गहना
बन दुहिता, कभी पितृवदना !
ममताभरी कभी लोरी दुलारी
पड गलबैंया मारे किलकारी
तबस्सुममें वह यौवनके खिले
सिसकती कभी झुर्रियोंमें  मिले..
कहे खुलेआम मनकी,आंखोही आंखोंमें
कनखियोंसे करे बात कभी सलाखोंमें
आजाद परिन्दोंमें ,सरहदकी गश्तोंमें
हालातके बंधोंमें, ख्वाबोंकी किश्तोंमें.
परिचित लिखावटकी अनखुली चिट्ठियोंमें
किसी नवजातकी अधखुली मुट्ठियोंमें..
अनबुझी चाहोंकी अनसुनी आहोंमें
निष्ठुर थपेडोंमें,सहलाती बाहोंमें
रदीफोंके मुहल्लोंमें,काफियोंके काफिलोंमें
अपने हिस्सेके अंधेरोंमें,गैरोंके उजालोंमें
आँखोंकी नमीमें, अपनोंकी कमीमें
कविता पनपती है, दिलोंकी जमींमें !

महिला दिवस

09 03 2008

महिला दिवस क्या होता है  ?

हर जीवनका प्रथम दिवसही

पहला महिला दिवस होता है

उस दिनकी कोखसे ही तो

रात-दिनका यह सिलसिला

अविरत जनम लेता है !

महिला दिवस कब नही होता ?

वह कौनसा दिन होगा

जो नारीके अस्तित्त्व बिना 

आरंभ या समाप्त हुआ होगा ?

संसारमें नारीके ना होते

क्या कोई भविष्यमेंभी होगा ? 

उस अंतहीन यात्राके पथिक

समय-रथके दो पहिये रहे

एक नर, दुजी नारी कहे

ईश्वर करे, दोनों साथ संतुष्ट रहें—

अन्यथा…..महिला दिवसकी गरिमा कैसी बनी रहे ?

यह कविता

04 02 2008

जीवनका एक गहरासा अनुभव
“मैंभी एक स्वतंत्र हूं जीव,”
कहने लगा हो मुझसे विभक्त,
“होना चाहूं मैंभी अभिव्यक्त!”

ले गया उसे दालनमें शब्दोंके,
चुनने आभरण उसकी पसंदोंके
थे वस्त्रालंकार नाना किसमके
पोशाक जोडेभी हरेक जिसमके

मिलाया उसे मैंने प्रबंधों-निबंधोंसे
भांति-भांतिकी व्यथाओं-कथाओंसे
घुमाया वाटिकामें नाटिकाओंकी
लुभाया उसे वसनोंसे प्रहसनोंके

प्रतिभाने दिखाए उसे रंग फूलोंके
सपने अनूठेसे सावनके झूलोंके
सूंघाए उसे गंध झीलोंके कमलोंके
सुनाए उसे नाद झरनोंके तालोंके

कुछभी उसे पर आया न रास,
अपनेयोग्य  कुछ पाया  न खास
रिक्तहस्त न लौटुंगा पर था विश्वास,
ले स्व-प्रकटनकी अनबुझी प्यास.

सहसा, अभिव्यक्तीकी बेला आन पडी
दृष्टी यकायक जब अनुभवकी मुडी
जहां एक रचना थी असमंझस खडी
पहचान गया ,यही है वह घडी

कहा उसने ,
“अब तुम और समय ना निकालो,
मुझे जल्द अपनी पंक्तियोंमें ढालो!”

उसकी मनीषा मैं कैसे टाल पाता,
किया आरंभ फिर लिखने यह कविता !

बिजली

03 02 2008

एक दिन सुबह तडके गया अपनी प्रतिभासे मिलने
कहा उसे,’ बिजली ‘ पर मुझे कुछ शब्द हैं लिखने

प्रतिभाने कहा, ” साथ कुछ भाव-विचारभी लाये हो,
या कविता लिखने मेरे पास खाली  हाथही आये हो? ”
आगे उसने स्पष्ट किया ,”हूं तुम्हारी चेतनाका निर्माण ,
जानती हूं केवल चलन,है काव्य-परंपरा इसका प्रमाण
मेरी दिशा-गती भाव और विचारही देते हैं
जो भीतर हृदय व मस्तिष्कमें पनपते हैं

मैंने कहा ” लेकिन इस निर्जीव वस्तुके विषयमें
भला कौनसे प्रबल भाव हो सकते हैं मेरे हृदयमें !”

सुझाया फिर उसने के अपने दिमागसे जरा सोचूं,
जहां मेरी बुद्धीका वास है,तनिक वहां जा कर पूंछूं

परंतु बुद्धीने कहा, ” मै रखती हूं लेखा-जोखा
निरंतर अनुभूती और विचारसे इस जीवनका ,
पंच इंद्रियोंको मिली अनुभूतियां और
उनपर तुम्हारी सोचका व्यापार,
इनसेही चलता मेरा कारोबार !

जिस विषयका तुमने अपने आपमें
ना अनुभव किया ना किया कुछ विचार,
मैं विवश हूं, पर तुम्हेंही तलाशना होगा
और तराशना होगा उससे अपना सरोकार!”

फिर दिलो-दिमागसे हुआ बेजार,प्रतिभासेभी जब गया हार,
लौटा मैं हताश,अनलिखी निराधार कविताकी थामे पतवार
कागज-कलमके सिवा मेरे पास कुछ ना था,
प्रतिभाका सुनाया कडवा सही,पर सचही था

अब सोचा है सीधे जा बिजलीसेही मिलूंगा,
और उसको गर थोडा-बहुतभी समझ पाऊंगा,
तो क्या पता,शायद कुछ लिखभी जाऊंगा !

तनहाईयाँ

09 01 2008

कुछ इस कदर बढ चुकी है तनहाईयोंकी आबादी
मुश्किल हो गया है पाना इनकी भीडसे आजादी

भीड हुई तो क्या , तनहाईयोंपे उसका जोर नहीं
भीडकी ही तो बहनें हैं, तनहाईयाँ कोई और नहीं

आने दो इन्हे, क्यूँ हो घबराते, ये कोई गैर नहीं
जाने कबसे हैं साथ, तनहाईयोंसे कोई बैर नही

आने दो इन्हें, ना दस्तक ना है कोई शोर कहीं
बेचारी तनहाईयाँ, इन्हें मेरे सिवा कोई और नही

तनहाईयाँभी क्या कभी अकेलापन सह पाती हैं ?
गर हाँ, तो क्यूँ बार-बार मेरे पास चली आती हैं?

तनहाईयाँ कबसे अकेलेपनसे कतराने लगीं ?
तनहा मुझेभी देख , करीब मेरे ये आने लगीं.

तनहाईयोंका इक दूसरेसे क्या रिश्ता होता है ?
तनहाईयोंकी यादमें क्या तनहा कोई रोता है ?

हमने सीखा है तनहाईयोंसेही यह अंदाजे-बयाँ,
इक टीस डेरा डाले है, गुफ्तगूँओंके दरमियाँ.

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नववर्ष

07 01 2008

समयकी नदीके तटपर
चिंतन कर , एकांतमें बैठकर
कर रहा था प्रतीक्षा,
नववर्षकी दहलीजपर.

सहसा, कालके प्रवाहसे निकलकर
संमुख खडा हुआ गतवर्ष उभरकर.

और करने लगा मुझसे निवेदन.
याद दिलाने, मेरेही कुछ वचन.

‘क्या हुआ उनका,
मेरी पूर्वसंध्यापर

जो किये थे तुमने वादे-
कुछ मुझसे, अन्य खुदसे,
कईं औरोंसेभी.

लिये थे कुछ निर्णय
कुछ मेरे, एक आध खुदके,
कईं औरोंके विषयमेंभी ?’

मैंने हँसकर कहा, ” वादे, निर्णय, वचन ?
किस जमानेके गतवर्ष हो तुम !

दिल बहलानेका एक तरीका है,
हर नववर्षसे मेरा यही सलीका है

कई वर्षोंकी अपनी तपस्या है
तुमने इसे गंभीरतासे लिया,
यह तुम्हारी अपनी समस्या है !”

उसने फिर पूछही डाला,

‘यह जो तुम्हारे पास है थैला
उसमें आखिर है क्या भला ?’

मैंने कहा,

” वही, हर सालका मसाला,

नववर्षके लिये- नये निर्णय,
नये वचन, नयी माला ! “