होली ( हिन्दी गजल )

चलो रंगरेलिया मनाएं, कहां छिपी होली है
बुरा नहीं मानेगी वह, भई आखिर होली है !

अनगिनत रंगों में तेरे मैं ढला हूं जिंदगी, पर
बचा कालिख से बुराई की, आज तो होली है

चाहतों में मैं तुम्हारी कुछ भी बनने से रहा
कुछ तो बनके ही रहूंगा देख लेना, होली है

नया नाम हर रोज़ वह देता आया है मुझे
आज मीठी गाली उसकी, शायद होली है …

नाराज़ ही मुझसे रहा, कहा पर कभी नहीं
क्यों जुबां खुली है आज, याद आया होली है !

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3 प्रतिसाद to “होली ( हिन्दी गजल )”

  1. alpana Says:

    नाराज़ ही मुझसे रहा, कहा पर कभी नहीं
    क्यों जुबां खुली है आज, याद आया होली है !

    bahut khuub! sach hi to hai holi mein sab maaf hai -aur kahne ki azadi hai.
    holi mubaraq ho.

  2. banshi Says:

    best literary side i am fan of it

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