तनहाईयाँ

कुछ इस कदर बढ चुकी है तनहाईयोंकी आबादी
मुश्किल हो गया है पाना इनकी भीडसे आजादी

भीड हुई तो क्या , तनहाईयोंपे उसका जोर नहीं
भीडकी ही तो बहनें हैं, तनहाईयाँ कोई और नहीं

आने दो इन्हे, क्यूँ हो घबराते, ये कोई गैर नहीं
जाने कबसे हैं साथ, तनहाईयोंसे कोई बैर नही

आने दो इन्हें, ना दस्तक ना है कोई शोर कहीं
बेचारी तनहाईयाँ, इन्हें मेरे सिवा कोई और नही

तनहाईयाँभी क्या कभी अकेलापन सह पाती हैं ?
गर हाँ, तो क्यूँ बार-बार मेरे पास चली आती हैं?

तनहाईयाँ कबसे अकेलेपनसे कतराने लगीं ?
तनहा मुझेभी देख , करीब मेरे ये आने लगीं.

तनहाईयोंका इक दूसरेसे क्या रिश्ता होता है ?
तनहाईयोंकी यादमें क्या तनहा कोई रोता है ?

हमने सीखा है तनहाईयोंसेही यह अंदाजे-बयाँ,
इक टीस डेरा डाले है, गुफ्तगूँओंके दरमियाँ.

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One Response to “तनहाईयाँ”

  1. mehhekk Says:

    bahut khub,tanhayiyan koi gair nahi,unse koi bair nahi.

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